खबर जन बुलेटिन 15/दिसंबर/2025
भौतिकवाद मानवीय सभ्यता पर एक आपदा एक डिजास्टर है।
जिसका उदाहरण उत्तराखंड का पलायन है।
बदलाव किसी के लिए वरदान साबित होते हैं।
और किसी के लिए अभिशाप बन जाते हैं।
ऐसा ही कुछ हुआ इस निर्धन महिला के साथ जिनका नाम श्रीमती रेजा देवी है।
जो ग्राम पंचायत बावई के सिद्वाधार तोक, जिला पंचायत वार्ड चोपता,तल्लानागपूर, विकास खंड अगस्त्यमुनि, जनपद रूद्रप्रयाग की मूल निवासी हैं।
और अनुसूचित जाति की श्रेणी में आती हैं।
उम्र लगभग 55 वर्ष है।
पति के देहांत हुए लगभग तीन वर्ष गुजर चुके हैं।
एक बेटा है।
वो भी छोटा और बेरोज़गार है।घर पर कमाने वाला कोई नहीं है।
ध्याड़ी मजदूरी करके ये महिला अपना और अपने परिवार का जीवन यापन करती है।
और विगत तीन वर्षों से भारत की एक नयी तकनीकी समस्या से गुजर रही है।
वो समस्या है कि इनका आधार कार्ड नहीं बन पा रहा है।
ये विगत तीन वर्षों से देहरादून जैसे शहर तक कयी आधार कार्ड सेंटरों के चक्कर लगा चुकी हैं।
लगभग 15 से अधिक बार ये आधार कार्ड सेंटर जाकर अपने आधार कार्ड के लिए आवेदन कर चुकी है।
किंतु इसका आधार कार्ड आज तक घर नहीं पहुंचा। समस्या क्या है।
ये आधार कार्ड सेंटर वाले भी इन्हें नहीं बता पा रहे हैं।
वो कभी कह रहे हैं।
तीन दिन में आ जायेगा कभी कह रहे हैं सात दिन में आ जायेगा।
पर वो शुभ दिन आज तक नहीं आया जब इनको इनका आधार कार्ड मिला हो।
जनता दरबार से लेकर जिलाधिकारी महोदय तक ये इसकी शिकायत दर्ज करवा चुकी है।
पर इसका निस्तारण आज तक नहीं हो पाया है।
अब ये बैचारी थक हार चुकी है।
आधार कार्ड न बनने के कारण न इनको विधवा पैंशन मिल पा रही है।
न राशनकार्ड में इनका नाम है।
इसलिए राशन भी नहीं मिल पा रही है।
इसी कारण सरकार की किसी भी अनुदान या योजना का लाभ ये महिला नहीं उठा पा रही है।
जो लोकतांत्रिक व्यवस्था में इस महिला के साथ न्यौचित न्याय नहीं है।
