वनाग्नि की रोकथाम, कार्बन फाइनेंस और पर्यावरण संरक्षण के जरिए ग्रामीण समुदायों की आजीविका सुदृढ़ करने पर जोर

देहरादून: राज्य पर्यावरण संरक्षण एवं जलवायु परिवर्तन तथा इकोलॉजी से संबंधित पहल के तहत उत्तराखंड में ग्रामीण आजीविका के सुदृढ़ीकरण और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के उद्देश्य से मंगलवार को होटल फेयरफील्ड, देहरादून में एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला में जलवायु-अनुकूल आजीविका मॉडल विकसित करने, ग्रामीण समुदायों की आय बढ़ाने, वनाग्नि की रोकथाम और कार्बन फाइनेंस की संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा की गई।

कार्यशाला में उत्तराखंड शासन के वन एवं पर्यावरण विभाग के सचिव सी. रविशंकर तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में भारत सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की उप सचिव डॉ. सुचित्रा करल उपस्थित रहीं। इस अवसर पर निदेशक, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन श्री एस.पी. सुबुद्धि सहित विभिन्न विभागों, संस्थानों और संबंधित परियोजनाओं के प्रतिनिधियों ने प्रतिभाग किया।

कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका के ऐसे मॉडल विकसित करना रहा, जो जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के साथ ही स्थानीय समुदायों के आर्थिक सशक्तीकरण में सहायक हों। इस दौरान ग्रामीण आजीविका गतिविधियों को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ने और उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग को बढ़ावा देने की रणनीतियों पर विचार-विमर्श किया गया।

कार्यशाला के तकनीकी सत्र में शशि वैभव कुमार साह, संयुक्त निदेशक, द्वारा वनाग्नि की रोकथाम में कार्बन फाइनेंस की भूमिका एवं संभावनाओं से संबंधित जानकारी साझा की गई। उन्होंने बताया कि कार्बन फाइनेंस के माध्यम से वन संरक्षण, वनाग्नि के जोखिम को कम करने, कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने तथा जलवायु-अनुकूल गतिविधियों को प्रोत्साहित करने के प्रयासों को सहयोग मिल सकता है। साथ ही, ग्रामीण समुदायों को इन पहलों से जोड़कर आजीविका के नए अवसर विकसित किए जा सकते हैं।

कार्यशाला में मुख्य रूप से निम्नलिखित विषयों पर चर्चा की गई:

जलवायु-अनुकूल आजीविका मॉडल का विस्तार: उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में जलवायु-अनुकूल आजीविका गतिविधियों को प्रोत्साहित करने और उनके प्रभावी क्रियान्वयन की रणनीतियों पर विचार किया गया।

ग्रामीण आजीविका का सशक्तीकरण: कृषि, बागवानी, पशुपालन, बीज उत्पादन तथा अन्य ग्रामीण आजीविका गतिविधियों को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल बनाने पर जोर दिया गया।

वनाग्नि की रोकथाम एवं कार्बन फाइनेंस: वन क्षेत्रों के संरक्षण, वनाग्नि के जोखिम को कम करने और कार्बन फाइनेंस के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी गतिविधियों को बढ़ावा देने की संभावनाओं पर चर्चा हुई।

परियोजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन: संबंधित विभागों, संस्थानों और परियोजना प्रतिनिधियों के बीच समन्वय स्थापित कर योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करने तथा निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने के उपायों पर मंथन किया गया।

कार्यशाला में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का सामना करने के लिए ग्रामीण समुदायों को आजीविका के बेहतर अवसर उपलब्ध कराने के साथ प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भी सुनिश्चित करना आवश्यक है। इसके लिए विभिन्न विभागों एवं संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय, स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों का सतत उपयोग और समुदायों की सक्रिय भागीदारी महत्वपूर्ण है।

कार्यशाला में प्रतिभागियों ने अपने विचार साझा करते हुए जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के अनुरूप आजीविका के नए अवसर विकसित करने तथा ग्रामीण क्षेत्रों में सतत विकास को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर बल दिया।